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Wednesday, 25 December 2019

मार्तण्ड सूर्य मंदिर / Martand Sun Temple


मार्तण्ड सूर्य मंदिर / Martand Sun Temple


  क्या आप जानते है भारत का खूबसूरत पर्यटन स्थल कश्मीर सिर्फ अपनी खूबसूरती के लिए ही नहीं बल्कि कुछ बेहद खास मन्दिरों के लिए भी जाना जाता है, जिनमे से एक है मार्तंड सूर्य मंदिर। 7वीं से 8वीं शताब्दी में बना यह मंदिर भगवान सूर्य देव को समर्पित एक हिंदु मंदिर है। ‘मार्तंड’ यह नाम सूर्य देव का ही नाम है।

Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

  मार्तंड सूर्य मंदिर विश्व के सुंदर मंदिरों की श्रेणी में भी अपना स्थान बनाए हुए है। बर्फ से ढके हुए पहाड़ों में स्थित यह मंदिर इस स्थान का करिश्मा ही कहा जाएगा। इस मंदिर से कश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य आसानी से दिखाई देता है। जम्मू और कश्मीर राज्य के अनंतनाग नगर में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर की उत्तरी दिशा से ख़ूबसूरत पर्वतों का नज़ारा भी देखा जा सकता हैं। आप मंदिर घूमते हुए एक सरोवर को भी देख सकते हैं, जिसमे आज भी रंग बिरंगी मछलियां तैरती हुई नजर आती हैं।
  वर्तमान में मार्तंड सूर्य मंदिर खंडहर में तब्दील हो गया है।

मार्तंड सूर्य मंदिर का इतिहास / History of Martand Sun Temple


  चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ों से घिरे इस मंदिर के निर्माण में वर्गाकार चूना-पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण कर्कोटक वंश से संबंधित राजा ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा जम्मू कश्मीर के छोटे से शहर अनंतनाग के पास एक पठार के ऊपर करवाया था। इसकी गणना ललितादित्य के प्रमुख कार्यों में की जाती है।

मार्तंड सूर्य मंदिर की वास्तुकला 


  मार्तंड सूर्य मंदिर दक्षिण कश्मीर भाग में स्थित छोटे से शहर अनंतनाग से 60 किमी की दूरी पर स्थित एक पठार के ऊपर स्थित है। इसमें 84 स्तंभ हैं जो नियमित अंतराल पर रखे गए हैं। मार्तण्ड सूर्य मंदिर का आंगन 220 फुट x 142 फुट है। यह मंदिर 60 फुट लम्बा और 38 फुट चौड़ा था। इसके चतुर्दिक लगभग 80 प्रकोष्ठों के अवशेष वर्तमान में हैं। इस मंदिर के पूर्वी किनारे पर मुख्य प्रवेश द्वार का मंडप है। द्वारमंडप तथा मंदिर के स्तम्भों की वास्तु-शैली रोम की डोरिक शैली से कुछ अंशों में मिलती-जुलती है।

Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

  मार्तंड सूर्य मंदिर अपनी खूबसूरत वास्तुकला के चलते पूरे देश में प्रसिद्ध है, यह मंदिर अपनी हिंदू राजाओं की स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। इस मंदिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है जो उस समय के कलाकारों की कुशलता को दर्शाता है।

विदेशी आक्रमण


 करीब छह सौ वर्ष पूर्व 15 वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रांता सिकंदर बुतशिकन ने आक्रमण कर मंदिर को लगभग पूरी तरह से नष्ट कर दिया।

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English Version

मार्तण्ड सूर्य मंदिर / Martand Sun Temple


  Do you know that the beautiful tourist destination of India, Kashmir is known not only for its beauty but also for some very special temples, one of which is Martand Sun Temple.  Built in the 7th to 8th century, this temple is a Hindu temple dedicated to Lord Surya Dev.  'Martand' is the name of the sun god.

Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

   Martand Sun Temple also holds its place in the category of beautiful temples of the world.  This temple situated in the snow-covered mountains will be called the charisma of this place.  The panoramic view of the Kashmir valley is easily visible from this temple.  There is a famous temple located in Anantnag Nagar in the state of Jammu and Kashmir.  A view of beautiful mountains can also be seen from the northern direction of the temple.  You can also see a lake, walking in the temple, in which colorful fish are still seen swimming.

   Presently Martand Sun Temple has been converted into ruins.

इतिहास / History of Martand Sun Temple


    Square limestone was used in the construction of this temple surrounded by snow-capped mountains.  Martand Sun Temple was built by King Lalitaditya Muktapeed belonging to the Karkotak dynasty atop a plateau near the small town of Anantnag in Jammu and Kashmir.  It is counted among the major works of Lalitaditya.

Architecture of Martand Sun Temple


   Martand Sun Temple is situated atop a plateau situated 60 km from the small town of Anantnag located in the south Kashmir part.  It has 84 columns which are placed at regular intervals.  The courtyard of the Martand Sun Temple is 220 feet x 142 feet.  The temple was 60 feet long and 38 feet wide.  There are presently the remains of about 80 cells around it.  On the eastern side of this temple is the mandapa of the main entrance.  The architectural style of the Dvamandap and the pillars of the temple is somewhat similar to the Doric style of Rome.

Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

    Martand Sun Temple is famous all over the country due to its beautiful architecture, this temple is the finest specimen of the architecture of its Hindu kings.  Square lime stone bricks have been used to build this temple which shows the skill of the artists of that time.

Forien Invasion


   Nearly six hundred years ago in the 15th century, the Muslim invader Alexander Butashikan attacked and almost completely destroyed the temple.

छाया चित्रे / Images of the Martand Sun Temple


Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर
Martand Sun Temple / मार्तंड सूर्य मंदिर

Martand Sun Temple
Martand Sun Temple




Monday, 23 December 2019

कोणार्क सूर्य मंदिर / Konark Sun Temple

           

कोणार्क सूर्य मंदिर / Konark Sun Temple


           कोणार्क सूर्य मन्दिर भारत में उड़ीसा राज्य में जगन्नाथ पुरी से ३५ किमी उत्तर-पूर्व में कोणार्क  नामक शहर में स्थित है। यह भारतवर्ष के चुनिन्दा सूर्य मंदिरों में से एक है। सन् १९८४ में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है।

Konark Sun Temple
Konark Sun Temple

 पौराणिक महत्त्व


  यह मन्दिर सूर्य देव को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय लोग 'बिरंचि-नारायण' कहते थे। इसी कारण इस क्षेत्र को अर्क-क्षेत्र (अर्क=सूर्य) या पद्म-क्षेत्र कहा जाता था। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके श्राप से कोढ़ रोग हो गया था। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में, बारह वर्षों तक तपस्या की और सूर्य देव को प्रसन्न किया था। सूर्यदेव, जो सभी रोगों के नाशक थे, ने इसके रोग का भी निवारण कर दिया था। तदनुसार साम्ब ने सूर्य भगवान का एक मन्दिर निर्माण का निश्चय किया। अपने रोग-नाश के उपरांत, चंद्रभागा नदी में स्नान करते हुए, उसे सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली। यह मूर्ति सूर्यदेव के शरीर के ही भाग से, देवशिल्पी श्री विश्वकर्मा ने बनायी थी। साम्ब ने अपने बनवाये मित्रवन में एक मन्दिर में, इस मूर्ति को स्थापित किया, तब से यह स्थान पवित्र माना जाने लगा।

 स्थापत्य एवं इतिहास


  कोणार्क शब्द, 'कोण' और 'अर्क' शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है। इसे १२३६-१२६४ ईसा पूर्व गंग वंश के तत्कालीन सामंत राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर, भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन् १९८४ में ‘विश्व धरोहर स्थल’ घोषित किया गया है। कलिंग शैली में निर्मित इस मन्दिर में सूर्य देव (अर्क) को रथ के रूप में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है। सम्पूर्ण मन्दिर स्थल को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुये निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। परन्तु वर्तमान में सातों में से एक ही घोड़ा बचा हुआ है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को परिभाषित करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो अर दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। यहाँ पर स्थानीय लोग प्रस्तुत सूर्य-भगवान को बिरंचि-नारायण कहते थे।
मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मण्डप में जहाँ मूर्ति थी, अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता से पूर्व ही रेत व पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था ताकि वह मन्दिर और क्षतिग्रस्त ना हो पाए। इस मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं:
 •बाल्यावस्था-उदित सूर्य- ८ फीट
 •युवावस्था-मध्याह्न सूर्य- ९.५ फीट
 •प्रौढ़ावस्था-अपराह्न सूर्य-३.५ फीट
इसके प्रवेश पर दो सिंह हाथियों पर आक्रामक होते हुए रक्षा में तत्पर दिखाये गए हैं। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये २८ टन की ८.४फीट लंबी ४.९ फीट चौड़ी तथा ९.२ फीट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार कर लिया है। ये १० फीट लंबे व ७ फीट चौड़े हैं। मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके के प्रवेश द्वार पर ही नट मंदिर है। ये वह स्थान है, जहां मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को अर्पण करने के लिये नृत्य किया करतीं थीं। पूरे मंदिर में जहां तहां फूल-बेल और ज्यामितीय नमूनों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की आकृतियां भी एन्द्रिक मुद्राओं में दर्शित हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं और कामसूत्र से लीं गईं हैं। मंदिर अब अंशिक रूप से खंडहर में परिवर्तित हो चुका है। यहां की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है। महान कवि व नाटककार रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस मन्दिर के बारे में लिखा है:- कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।
  तेरहवीं सदी का मुख्य सूर्य मंदिर, एक महान रथ रूप में बना है, जिसके बारह जोड़ी सुसज्जित पहिए हैं, एवं सात घोड़ों द्वारा खींचा जाता है। यह मंदिर भारत के उत्कृष्ट स्मारक स्थलों में से एक है। यहां के स्थापत्य अनुपात दोषों से रहित एवं आयाम आश्चर्यचकित करने वाले हैं। यहां की स्थापत्यकला वैभव एवं मानवीय निष्ठा का सौहार्दपूर्ण संगम है। मंदिर की प्रत्येक इंच, अद्वितीय सुंदरता और शोभा की शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण है। इसके विषय भी मोहक हैं, जो सहस्रों शिल्प आकृतियां भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्रों से भरी हैं। इनके बीच बीच में पशु-पक्षियों (लगभग दो हज़ार हाथी, केवल मुख्य मंदिर के आधार की पट्टी पर भ्रमण करते हुए) और पौराणिक जीवों, के अलावा महीन और पेचीदा बेल बूटे तथा ज्यामितीय नमूने अलंकृत हैं। उड़िया शिल्पकला की हीरे जैसी उत्कृष्ट गुणवत्ता पूरे परिसर में अलग दिखाई देती है।

Konark Sun Temple
Konark Sun Temple

  यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। इस प्रकार की आकृतियां मुख्यतः द्वारमण्डप के द्वितीय स्तर पर मिलती हैं। इस आकृतियों का विषय स्पष्ट किंतु अत्यंत कोमलता एवं लय में संजो कर दिखाया गया है। जीवन का यही दृष्टिकोण, कोणार्क के अन्य सभी शिल्प निर्माणों में भी दिखाई देता है। हजारों मानव, पशु एवं दिव्य लोग इस जीवन रूपी मेले में कार्यरत हुए दिखाई देते हैं, जिसमें आकर्षक रूप से एक यथार्थवाद का संगम किया हुआ है। यह उड़ीसा की सर्वोत्तम कृति है। इसकी उत्कृष्ट शिल्प-कला, नक्काशी, एवं पशुओं तथा मानव आकृतियों का सटीक प्रदर्शन, इसे अन्य मंदिरों से कहीं बेहतर सिद्ध करता है।
  यह सूर्य मन्दिर भारतीय मन्दिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी ढकी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से खास भिन्न नहीं लगता है। २२९ फीट ऊंचा मुख्य गर्भगृह १२८ फीट ऊंची नाट्यशाला के साथ ही बना है। इसमें बाहर को निकली हुई अनेक आकृतियां हैं। मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण ८५७ फीट X ५४० फीट का है। यह मंदिर पूर्व –पश्चिम दिशा में बना है। मंदिर प्राकृतिक हरियाली से घिरा हुआ है। इसमें कैज़ुएरिना एवं अन्य वृक्ष लगे हैं, जो कि रेतीली भूमि पर उग जाते हैं। यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा बनवाया उद्यान है।

ध्वंस सम्बन्धी किंवदन्तियाँ


   यहाँ पर मन्दिर की ध्वस्तता के सम्पूर्ण कारणों का उल्लेख करना जटिल कार्य से कम नहीं है। परन्तु यह सर्वविदित है कि अब इसका काफी भाग ध्वस्त हो चुका है। जिसके मुख्य कारण वास्तु दोष भी कहा जाता है परन्तु मुस्लिम आक्रमणों की भूमिका अहम रही है।

 वास्तु दोष

   कहा जाता है कि यह मन्दिर अपने वास्तु दोषों के कारण मात्र ८०० वर्षों में क्षीण हो गया था। जिसे वास्तु कला व नियमों के विरुद्ध कहा-सुना जाता है। इसी कारणवश यह अपनी समयावधि से पहले ही ऋगवेदकाल एवम् पाषाण कला का अनुपम उदाहरण होते हुए भी धराशायी हो गया।

  कालापहाड़

   कोणार्क मंदिर के गिरने से सम्बन्धी एक अति महत्वपूर्ण सिद्धांत, कालापहाड से जुड़ा है। उड़ीसा के इतिहास के अनुसार कालापहाड़ ने सन १५०८ में यहां आक्रमण किया और कोणार्क मंदिर समेत उड़ीसा के कई हिन्दू मंदिर ध्वस्त कर दिये। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मदन पंजी बताते हैं, कि कैसे कालापहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया। कोणार्क मंदिर सहित उसने अधिकांश हिन्दू मंदिरों की प्रतिमाएं भी ध्वस्त करीं। हालांकि कोणार्क मंदिर की २०-२५ फीट मोटी दीवारों को तोड़ना असम्भव था, उसने किसी प्रकार से दधिनौति (मेहराब की शिला) को हिलाने का प्रयोजन कर लिया, जो कि इस मंदिर के गिरने का कारण बना। दधिनौति के हटने के कारण ही मन्दिर धीरे-धीरे गिरने लगा तथा छत से भारी पत्थर गिरने से, मूकशाला की छत भी ध्वस्त हो गयी। उसने यहाँ की अधिकांश मूर्तियां और कोणार्क के अन्य कई मंदिर भी ध्वस्त कर दिये।

छायाचित्रे / Images of Konark Sun Temple



Konark Sun Temple
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Konark Sun Temple
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Konark Sun Temple
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मोढेरा सूर्य मंदिर / Modhera Sun Temple

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मोढेरा सूर्य मंदिर / Modhera Sun Temple

    मोढ़ेरा सूर्य मन्दिर भारत में गुजरात राज्य में अहमदाबाद से १०० किमी की दूरी पर मोढेरा नामक शहर में पुष्पावती नदी के तट पर स्थित है। यह भारतवर्ष के चुनिन्दा सूर्य मंदिरों में से एक है।

Modhera Sun Temple
Modhera Sun Temple

इतिहास / History of Modhera Sun Temple


  मंदिर में गर्भगृह के दीवार पर स्‍थापित एक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम ने ईसा पूर्व १०२२ से १०६३ में करवाया था। सोलंकी सूर्यवंशी थे, और वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इसलिए उन्होंने मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया। यह वही समय था जब सोमनाथ जोतिर्लिंग और आसपास के क्षेत्रों पर विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने अपने कब्जे में कर लिया था। गजनवी के आक्रमण के प्रभाव में आकर सोलंकीयों ने अपना वैभव और महिमा गंवाया था। सोलंकी साम्राज्य की महिमा, वैभव और गौरव को पुनः स्थापित करने के लिए सोलंकी राज परिवार और व्यापारी एकत्रित होकर भव्य मंदिर का निमार्ण किया। इस प्रकार मोढेरा के सूर्य मंदिर ने आकार लिया।

स्थापत्य


Modhera Sun Temple
Modhera Sun Temple


   इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया है। हिंदु शैली में बने इस मंदिर के तीन हिस्से हैं, पहला गर्भगृह, दूसरा सभामंडप और तीसरा सूर्य कुण्ड। मंदिर के गर्भगृह के अंदर की लंबाई 51 फुट 9 इंच और चौड़ाई 25 फुट 8 इंच है। सभामंडप में कुल 52 स्तंभ हैं। इन स्तंभों पर बेहतरीन कारीगरी से विभिन्न देवी-देवताओं के चित्रों और रामायण तथा महाभारत की कथाओं को दर्शाया गया है। ये स्तंभ नीचे से देखने पर अष्टकोणाकार और ऊपर से देखने पर गोल दिखते हैं। मंदिर के निर्माण में ख्‍याल रखा गया है कि सुबह सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह को रोशन करे। सभामंडप के आगे एक विशाल कुंड सूर्यकुंड है जिसे रामकुंड भी कहते हैं। 

विदेशी आक्रमण


   अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों से मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा और कई मूर्तियां खंडित हो गई। फिल्‍हाल ये मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

पौराणिक मान्यता 


   स्कंद पुराण और ब्रम्ह पुराण के अनुसार प्राचीन समय में मोढेरा क्षेत्र धर्मरन्य के नाम से विख्यात था। गुरु वसिष्ठ ने इस क्षेत्र के लिए श्री राम से कहा था कि यह धर्मरन्य स्थान आत्मा को शुद्धि देने वाला और ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्ति दिलाने वाला स्थान है। 

छायाचित्रे / Images of Modhera Sun Temple



Modhera Sun Temple
Modhera Sun Temple

Modhera Sun Temple
Modhera Sun Temple

Modhera Sun Temple
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